Monday, 25 June 2012

गुरु का महत्व



1 . गुरु ब्रह्मा गुरुर बिष्णु /
     गुरु देवो महेश्वरः / 
      गुरु साक्षात परा ब्रह्मा /
       तस्मै श्री गुरवे नमः/

(गुरु ब्रह्मा, विष्णु और शिव के वास्तविक प्रतिनिधि है/ वह श्रृष्टि करता है., अज्ञानता और मूढ़ के नाश कर ज्ञान फैलाता है/ मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

2 . अखंड मंडलाकारं /
    व्याप्तं येणं  चराचरम येना /
    तत्पदं दर्शितं  येना 
    तस्मै श्री गुरवे नमः / 

(गुरु सर्वोच्च शक्ति के सम्बन्ध में मार्ग निर्देशक है/ जो निर्जीव और सजीवो को विश्व में व्यबस्थित करता है/ मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

3 . अग्न्याना तिमिरान्धस्य , 
    ग्न्याना अंजना शलाकया , / 
    चक्षुहु  उन्मीलितम येणं /
     तस्मै श्री गुरवे नमः /

( गुरु अन्धकार से (कुकीर्ति ) से बचाता है/ परम जिज्ञासा  के प्रति चेतना रूपी ज्ञान को बाम की तरह लगता है/ मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

4 . स्थावरं जंगमं व्याप्तं /
   यत्किंचित सचरा चरम /
   तत्पदं दर्शितं येना / 
    तस्मै श्री गुरवे नमः/

(गुरु वे है जो सबो को ज्ञान रूपी प्रकाश दे सकते है/ जो जाग्रति लाते है, उन सबो में जो जाग्रत, स्वप्ना और सुषुप्ति अवस्था में रहते है/ मै ऐसे                
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )
५. चिन्मयम व्यापी यत्सर्वं 
    त्रैलोक्य सचरा चरम 
    तत्पदं दर्शितं येना /
    तस्मै श्री गुरवे नमः /

(धर्म गुरु जो एकल दैविक अस्तित्वा के बारे में निर्देश देता है, साथ ही साथ जो सक्रिय है /मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

6 .सर्व श्रुति शिरोरतना /
विराजिता पदाम्बुजः /
वेदान्ताम्बुजा सूर्यो यह /
 तस्मै श्री गुरवे नमः /

(गुरु जो श्रुति के सागर है, ज्ञान के सूर्य है/   मै ऐसे    गुरु को प्रणाम करता हूँ /           
                                      
7 . चैतान्याह शाश्वतः शांथो /
    व्योमातीतो निरंजनः /
    बिंदु नादा कलातीतहा 
    तस्मै श्री गुरवे नमः

 (जिसका परिवर्तन न हो, जो सर्व व्याप्त हो/ शांति की जिज्ञासु , जिसमे एक विम्ब हो, जो अन्तरिक्ष से बहार है, जिनका दृष्टिकोण हमेशा आनंदित  करने वाले है ./  मै ऐसे    गुरु को प्रणाम करता हूँ /           

8 . ग्न्याना शक्ति समारूदः 
तत्व माला प्रदानेय्ना/
भुक्ति मुक्ति प्रदानेय्ना 
 तस्मै श्री गुरवे नमः/

( जो ज्ञान के सागर है, जो हमेशा योगी रूप में रहते है/ ईश्वरीय सिन्धांत के ज्ञान से सजे होते है/जो हमें चुराकरण(मुंडन)  संस्कार से दीक्षित  बनाते है/   मै ऐसे  गुरु को प्रणाम करता हूँ / )          

9 अनेक जन्मा संप्राप्ता /
   कर्म बंधा विदाहिने /
   आत्मा ग्न्याना प्रदानेय्ना 
    तस्मै श्री गुरवे नमः/

(जो मुझे बन्धनों से मुक्ति में सहायता करते है/ जो हमें आत्म ज्ञान  के सम्बन्ध में उपदेशित करते है/ मै ऐसे  गुरु को प्रणाम करता हूँ)

10 शोषणं भाव सिन्धोस्चा /
    ग्न्यापनाम सारसम्पदाहा /
    गुरोर पादोदकं सम्यक /
    तस्मै श्री गुरवे नमः/

(जो, जीवन रूपी सागर को पार करने में सहायता करते है, जो हमें दैवीय शक्ति के भेद को स्पस्ट करते है/मै उनके कदमो पर शीशी अर्पित करता हूँ/ मै ऐसे  गुरु को प्रणाम करता हूँ)

11 . न गुरोर अधिकम तत्वं 
       न गुरोर अधिकम तपः /
      तत्व ग्न्यानात परम नास्ति /
      तस्मै श्री गुरवे नमः /

(गुरु से बढ़ कर कोई सिन्धांत नहीं है/ गुरु के ध्यान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है/मै ऐसे            
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

12 .मन्नाथान श्री जगनाथो /
      मद्गुरुहू श्री जगद गुरुहू /
      मध् आत्मा सर्व भूतात्मा /
      तस्मै श्री गुरवे नमः /

(विश्व के भगवान मेरे भगवान् है/ विश्व के गुरु मेरे गुरु है / जो सबो में विद्यमान है/ मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

13 . गुरोरादी अनादिस्चा /  
     गुरुह परम दैवतं /
     गुरोह परतरं नास्ति/ 
     तस्मै श्री गुरवे नमः

(अर्थ : गुरु का न आदि है और न अंत / दृश्य रूप में गुरु भगवान है/ गुरु के बहार कुछ भी नहीं है/मै ऐसे                 
                                       गुरु को प्रणाम करता हूँ. )

"ध्यानामूलम, गुरुर मूर्थिही / पूजामूलं गुरोह पदम् //  मंत्रमूलम गुरोर वाक्यं  / मोक्ष मूलम गुरु कृपा //
अर्थ : सबसे बेहतर ध्यान, गुरु का ध्यान करना है/  सबसे बेहतर पूजा गुरु के चरणों की है/ गुरु के शब्द मंत्र है/ गुरु के कृपा मोक्ष के साधन  है //


स्वामी सिवानन्द : ब्रह्म मुहुर्त ( सुबह 4  बजे) अपने गुरु को चरण पर कमल के फूल रख कर ध्यान करे/ जाप और ध्यान करे/ 
स्नान के बाद , अपने गुरु के पांव पर कमल के फूल से पूजा करे/ या उसके मूर्ति को/ या फूलो इ तस्वीरों को, ------/ पुरे दिन व्रत रखे/ या सिर्फ दूध ले/  दोपहर में गुरु के अन्य शिष्यों से  गुरुओ के उपदेश के सम्बन्ध में बातचित करे ----- /

शान्ति से स्नेह करे/ पुस्तकों का या गुरु के लेख का अध्ययन करे/ मानसिक रूप से ध्यान केन्द्रित हो  ---------------/

रात में गुरु के अन्य शिष्यों के साथ भगवान् और गुरु की महत्व की गान गायें / पूजा करने के सबसे बढियां तरिका गुरु के उपदेश का अनुशरण करे  --------------/

गुरु शिव के तीसरे आंख है/ विष्णु के चार हाथ, ब्रह्मा एके चार मस्तक है -----------ब्रह्मपुराण 

No comments:

Post a Comment